आसन

  •   प्रिय साथियों आज हम आसन के बारे में जानेंगे आसन के स्वरूप इस के भिन्न-भिन्न प्रकार संधान प्रयोग तैयारी के बारे

    में जाना है जैसा कि आप जानते हैं कि चाहे बात अष्टांग योग की हो या हठयोग की दोनों में ही आसन को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है वास्ता आसनों से हमारे अंदर शुद्धता एवं स्थिरता का विकास होता है अताउल शारीरिक एवं मानसिक रूप से सुखी होने के बाद पर योग साधक के लिए यह भी आवश्यक है कि वह साधना के लिए लंबे समय तक स्थिरता के साथ एक आसन में बैठ सकें जिससे कि उसकी साधना में प्रगति और सके अन्यथा उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने में बाधा उपस्थित होती है इसलिए महर्षि पतंजलि ने कहा है।
  •           " स्थिरसुखमांसनस्"  सूत्र २/४६                                                            अर्थात        
  • स्थल था पूर्वक एवं सुख पूर्वक एक विशेष शारीरिक स्थिति में बैठने का नाम ही आसन है आसन का अर्थ -आसन शब्द पर यदि हम दृष्टिपात करें तो आसन शब्द की विभक्ति संस्कृत व्याकरण के हंस धातु से हुई थी जिसका अर्थ है बैठना परंतु यहां के दो शब्द बताएं हैं पहला जिस पर हम बैठते हैं और दूसरा हमारे साली की कुश्ती पहले अर्जुन में के रूप में बैठने से आशय चटाई मेरा हिरण की छाल चौकी गद्दी इत्यादि पर बैठना बताया है दूसरे शब्दों में आसन से आशय हमारी शारीरिक स्थिति से है कि किस प्रकार हमारे हाथ पर अथवा अवस्था लिए हुए हैं जैसे हमारे शरीर की स्थिति धनुष के समान प्रतीत रहती है उसे धनुरासन कहा जाता है वैसे ही वह हम खड़े होकर ऊपर शरीर को खींचते हैं तो उसे ताड़ासन कहते हैं आशंका यह अर्थशास्त्रियों ढंग से आपको बताया गया है व्यवहार रूप से यदि आज संसद को समझा जाए तो प्रत्येक मनुष्य को अपने कार्य को संपादित करने के लिए आसन की आवश्यकता होती है मैं आसन चाहे किसी विशेष स्थान पर बैठकर कार्य करने से हो अथवा शरीर मनुष्य के सारा रिक अवस्था हो आसन की आवश्यकता होती है । 
  •  योग में आसनों को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है । 
  • १. शरीर संवर्धनात्मक आसन २. ध्यानात्मक आसन ३.विश्रामात्मक 
  • १- शरीर संवर्धनात्मक आसन -शरीर समाधान तक शरीर का विकास करने वाले मांसपेशियों में खिंचाव होने वाले जिन्हें करने के छे बाद रक्त संचार बढ़ता शरीर में सुडौलता आने लगे शरीर मजबूत और क्रियाशील प्रतीत होने लगे आदि कुल मिलाकर हम कहें सकते हैं कि जिन आसनों को करने से शरीर का विकास हो शरीर सुंदर एवं कांति मान प्रतीत हो शरीर में मजबूती व खुला हुआ महसूस हो वही शरीर सर्व धनात्मक आसान है। :-जैसे 
  • गोमुखासन
  • धनुरासन 
  • अद्र्मछंदरनाथशास
  • उत्कटासन
  • मयूरासन 
  • मंडूकासन
  • उत्तानमंडूकासन
  • वृक्षासन
  • सुखासन
  • भुजंगासन,आदि शरीर संवर्धनात्मक आसन कहे जाते हैं।

  • २.ध्यानात्मक आसन :-जिन आसनों को करने पर मन की अवस्था स्थिर एवं अगर हो जाए किसी प्रकार की गतिशीलता उसमें ना दिखाई दे, अर्थात साधक जिन आसनों में बैठकर सहजता का अनुभव करें उन उन आसनों में बैठकर वह स्वयं को ध्यान को करने के लिए तैयार कर ले वह धनात्मक आसन है इन आसनों के अंतर्गत आने वाले आसन निम्नलिखित हैं
  •  सिद्धासन 
  • पद्मासन 
  • भद्रासन 
  • मुक्तासन  
   स्वस्तिकाआसन इन आसनों को घेरण्ड संहिता में धनात्मक आसनों के नाम से जाना जाता है
३.विश्रान्तिकारक आसन :-विश्राम से तात्पर्य आराम से है अर्थ अर्थात आसनों को करने पर सचिन आराम का अनुभव करें ।
  इसके अंतर्गत जिन आसनों का वर्णन है वह है
 • शवासन
 • मकरासन
 यह जो आसनों का वर्गीकरण का है यह घेरंड संहिता के अनुसार बताया गया था इसी प्रकार स्वामी सत्यानंद सरस्वती के अनुसार उपासना का वर्णन भी अलग-अलग है उन आसनों का वर्गणी में खड़े होकर करने वाले बैठकर करने वाले और पीठ के बल करने वाले आसन और पेट के बल करने वाले आसनों का वर्णन किया गया है।
आसनों के सिद्धांत

  1. जब आप आसन को शुरू करें तो सर्वप्रथम एक साफ-सुथरे सीलन मुक्त हवादार एवं प्रकाश युक्त कमरे का ही चयन करें कमरा एकांत स्थान पर हो तो ज्यादा अच्छा होगा जिससे आसन को करने में एकाग्रता बनी रहेगी।
  2. आसन हमेशा धीरे-धीरे एवं सहजता से शुरू करें आसनों को करने में जल्दबाजी बिल्कुल भी ना करें आसनों को करने के क्रम में सरल अभ्यास से कठिन अभ्यासों का ही होना चाहिए।
  3. आसनों को कभी प्रतियोगिता की दृष्टि से नहीं करना चाहिए अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए।
  4. आसनों के अभ्यास के दौरान कमरे में रहे तो वहां धूप दीप इत्यादि का प्रयोग करते कर सकते हैं जिससे शारीरिक स्थिति के साथ साधक की मनो स्थिति भी परिवर्तन होता है परंतु ध्यान रहे धूप हल्की सुगंधित होनी चाहिए।
  5. आसनों को करने से यदि आपको पसीना निकल रहा है तो उसे तो लिया या रुमाल से पूछने के बजाय शरीर पर ही रगड़ लें जिससे आप की कोशिकाएं और अधिक कार्यशील होंगी यदि पसीना बहुत ज्यादा मात्रा में निकल रहा है तो स्वच्छ एवं दलितों लिया का प्रयोग करना चाहिए।
  6. आसनों का अभ्यास करने से पूर्व यदि फर्स्ट करण जैसे धोती बस्ती नीति नौलि त्राटक और कपालभाति का अभ्यास कर लिया जाए तो शरीर से गंदगी बाहर निकल जाती है जिससे आसन करने में सहायता होती है।
  7. आसनों को करने के बाद प्राणायाम परम आवश्यक है क्योंकि आसनों को करने से शरीर की बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है और ऊर्जा को पर आप लाने के लिए हमें प्राण तत्व ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जो हमारे प्राणायाम को करने से प्राप्त होती है
  8. शास्त्रों में आसनों को करने का समय प्रातः काल का ही बताया गया है इसलिए आसनों को प्रातः काल ही करें यदि प्रातः काल के समय आसन करने में असमर्थ हो तो साईं काल के समय भी आसनों को किया जा सकता है परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि भोजन और आसनों के क्रम में 4 से 5 घंटे का अंतराल हो तथा समय काल सोच के बाद ही अभ्यास करें तो स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा रहेगा।
  9. जिस समय भी आसन करते हैं तो इस बात को अवश्य ध्यान रखें कि प्रत्येक आसन के बाद कुछ देर विश्राम अवश्य कर लें यह आपके आसन पर निर्भर करता है कि किस श्रेणी का अभ्यास कर रहे हैं तत्पश्चात उसी के अनुसार विश्राम करना चाहिए
  10. आसनों के अभ्यास में यदि आगे झुकने वाले अभ्यास कर रहे हैं तो उसके बाद पीछे झुकने वाले अभ्यास भी अवश्य करें इसके विपरीत यदि पीछे झुकने वाले अभ्यास कर रहे हैं तो आगे झुकने वाला अभ्यास अवश्य करें।
  11. अभ्यास के समय ढीले ढीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें और यदि सूती वस्त्रों का प्रयोग कर रहे हैं तो यह बहुत अच्छा रहेगा लेकिन एक ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वस्तुओं को मौसम के अनुकूल इस्तेमाल करें।
  12. आसनों को कभी भी जमीन पर नहीं करना चाहिए जब भी आप आसन करें तो जमीन पर कोई कंबल चटाई या चादर का प्रयोग अवश्य करें।
  13. आसनों को करते समय कोई भी जवाब देने वाली वस्तु आपके शरीर पर ना हो जैसे अंगूठी घड़ी बेल्ट और बैंड अन्यथा रक्त का संचार पूर्ण रूप से पूरे शरीर में नहीं हो पाएगा।
  14. आसनों के अभ्यास को खाली पेट ही करना चाहिए।
टीवी टेलीविजन या पुस्तकों में देखकर कभी भी योग अभ्यास नहीं करना चाहिए जब भी आप अभ्यास करने जाएं तो किसी जानकार व्यक्ति की सलाह अवश्य लें इससे आपके आंसुओं को अच्छी तरह कर पाएंगे।
आसनों की उपयोगिता
   आसनों का प्रभाव हमारे संपूर्ण शरीर पर सकारात्मक रूप से पड़ता है आसनों से शरीर में पड़ने वाले प्रभाव इस प्रकार बताए जा रहे हैं---

  1. प्रातः काल यदि गुनगुने पानी के सेवन के बाद हम 12 आसनों को तेज गति से करके मल त्याग करने के लिए जाएं तो भली-भांति साफ हो जाती है इससे हमारा उत्सर्जन तंत्र स्वस्थ रहता है।
  2. आसनों के अभ्यास से शरीर के सभी पाचक रस पूर्ण रूप से निकलने लगते हैं जिससे के लिए गए भोजन का पाचन भली भांति होता है इसलिए हमारा पाचन तंत्र की स्वस्थ रहता है।
  3. आसनों के नियमित अभ्यास से मांसपेशियां लचीली बनती हैं आना चिकत पेशियों पर भी हमारा बस नहीं होता किंतु ऐच्छिक पेशियां हमारे कार्य को भलीभाति प्रकार से करती हैं जिससे हमारा मांसपेशियों संस्थान स्वस्थ व कार्यशील रहता है।
  4. कंकाल तंत्र पर भी आसनों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है आसनों को प्रतिदिन करने से अस्थियां मजबूत होती हैं तथा शरीर की निश्चित आकृति बनती है।
  5. आसनों को करने से शरीर की गति बढ़ती है जिससे हमारा हृदय तीव्र गति से कार्य करता है इसी कारण इसी कारण संपूर्ण शरीर में ऊर्जा आने लगती है


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